बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

हम तेरे शहर से गुजरे

हम तेरे शहर से गुजरे , काफिला था साथ अपने
होते हैं दगाबाज तो , कच्ची उम्र के रंगी सपने 

खेल कर तुम तो गये , मन्जर हो गये हैं खड़े
चल रहे हैं गाफिल सी बहर में , यादों में सँग-सँग अपने

कुसूर कोई तो होता , टीस सी लिये दिल में
चिन्गारी दामन में लिये , यादों की हवाएँ थीं साथ अपने

बुझा दिए खुद ही , अपने हाथों अरमानों के दिये
कच्ची सीढ़ियाँ चढ़े थे , अपनी आँखों के रंगी सपने 

वफ़ा की राह में , बेकसी फूलों की देखो तो
खिले हुए हैं आरजू-ए-चमन में , खुशबू नहीं साथ अपने

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

नहीं इसका नाम !


हर आहट को समझा उसका पैगाम
हर मन्जर को किया मैंने सलाम

कितने ही पिये उम्मीद के जाम
कैसी है आहट , कैसे अन्जाम

अँगना में ठहरी है वो ही शाम
कोई सुबह क्या नहीं मेरे नाम

चलता है वही जो हमको थाम
वही अपनी डोरी वही गुलफाम

रँग देखे दुनिया के अजब अनाम
ख़्वाबों-ख्यालों की दुनिया तो ...नहीं इसका नाम , नहीं इसका नाम !

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

कितने साबुत और बचा क्या

चन्दा तेरा रूप पिऊँ क्या
दूर तू है तेरा साथ जिऊँ क्या

तू तन्हा दिन रात चला है
तेरी पीड़ है मुझसे जुदा क्या

मेरी आँख का आँसू चुप है
और भला खामोश सदा क्या

साथ साथ चलते हैं हम तुम
कितने साबुत और बचा क्या

तेरी मुसाफिरी बनी रहे
मेरा क्या है माँगूं क्या

मेरे गीतों में तू ही तू
ऐसा अपना नेह है क्या

दूर से दिखते मिलते हुए
धरती-अम्बर कभी मिले हैं क्या

पी लूँ चाँदनी चुल्लू भर
सफ़र में थोड़ा आराम क्या

सहराँ भी ले लेता दम-ख़म
तू भी बता, तेरी मर्जी क्या

मेरी आवाज में सुन सकते हैं _
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सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

हसरतों की देहरी पर

हसरतों की देहरी पर तुम
पाँव रखना सोच कर


है कहाँ आसान इतना
आना अपना लौट कर


है बहुत मगरूर इंसाँ
दिल लगाना सोच कर


लग गया जो दिल तो फिर
निभाना सीना ठोक कर


बेवफा निकलें जो सपनें
ये भी रखना सोच कर


होगा कहाँ अपना ठिकाना
खुद को पूछो रोक कर


मन्जर भी हैं मंजिल ही
देखो तो ये सोच कर


सफ़र के सजदे में तुम
सिर झुकाना , माथा ठोक कर

रविवार, 26 सितंबर 2010

इतना चुप हो जाऊँ

इतना चुप हो जाऊँ
कि बुत हो जाऊँ

तराशे गए हैं अक्स भी
मैं भी सो जाऊँ

सर्द आहों से पलट
जमाने की हवा हो जाऊँ

रूह को छू ले जो
रकीबों सी दुआ हो जाऊँ

कब बदलता है कोई
मैं ही काफिर हो जाऊँ

दर्द किसको नहीं होता
जुदा जिस्मो-जाँ हो जाऊँ

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

क्या-क्या पास हमारे निकले


कोई शुबहा कहीं नहीं है
रात हुई और तारे निकले

अरमाँ की गलियों में यूँ ही
हम अपना दिल हारे निकले

कोई मंजिल कहीं नहीं है
टूट के बिखरे सितारे निकले

बाँध सके जो हमको देखो
झूठे सारे सहारे निकले

अपनी चादर में फूलों के
काँटों से ही धारे निकले

डूबें कैसे बीच भँवर में
दूर बहुत ही किनारे निकले

उँगली पकड़ेंगे वो अपनी
ऐतबार के मारे निकले

पराई धड़कन , पराई साँसें
क्या-क्या पास हमारे निकले

सोमवार, 13 सितंबर 2010

दम बड़ा लगता है


इसे जरा ' प्यार का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है ' की तर्ज पर गुनगुनाएँ ...


उधड़े रिश्ते सिलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है

उलझ गए हैं मन के धागे
सुलझाने में , रेशमी गाँठें फिर खुलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है

बिखर गए जो अरमाँ अपने
उजड़ी बस्ती , वीराने को फिर बसने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है

प्यार का पहला ख़त ये नहीं है
बिखरी उमंगें , फिर चुनने में दम बड़ा लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है

उधड़े रिश्ते सिलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है