बुधवार, 2 मार्च 2011

ऐसे उठते हैं लोग दिलों से

ऐसे उठते हैं लोग दिलों से , जैसे कॉफ़ी-हाउस में लोग
इस मेज से उठ कर , उस मेज पे जा बैठे हों

कब लगती है देर परिन्दों को उड़ने में
आसमान की बाहें हैं , साथी मगर चुप बैठे हैं

पल-लम्हें सब दम साधे हैं , कैसे बोलें
शोर भरे जब दूर दूर से , मन बैठे हों

कैसे कह दें महज इत्तफाक है जिन्दगी
कभी किस्मत का इन्साफ कभी मर्जी का सिला ले बैठे हैं

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

लय लागी है किस से अन्दर


लाख सीपियाँ मोती अन्दर
फिर भी प्यासा क्यों है समन्दर
अपने जैसा ढूँढ रहा है
नट है या फिर कोई बन्दर

मत भोंको सीने में खन्जर
टूटे लम्हे , रूठा पिन्जर
कितनी बातेँ बदल गईं हैं
कहाँ रुका है कोई मन्जर

कौन मुक्कद्दर का है सिकन्दर
क्या तुमने देखा न कलन्दर
बेगाना सा इस दुनिया से
लय लागी है किस से अन्दर

रविवार, 30 जनवरी 2011

मिट्टी हूँ , ख़्वाबों में महक जाऊँगी

कच्ची मिट्टी हूँ , तराश लो
प्याला-ए-मीना या सागरो-सुराही की तरह

अजब सी बात है , उदास है जो पीता है
रंज का जश्न मनाने की तरह

बात सीधी सी है , चाहिए बस एक नजर
रहमत की इनायत की तरह

बूँद वही चखने को , वक्त रुका बैठा है
शबे-गम की ठहरी हुई सहर की तरह

ज़र्रा-ज़र्रा उधड़ गया अपना
इक नई शक्ल में ढलने की तरह

मिट्टी हूँ , ख़्वाबों में महक जाऊँगी
बचपन के नन्हें घरौंदों की तरह

बुधवार, 19 जनवरी 2011

रग-रग में धूप समाई न

आ बैठे निशाँ भी चेहरे पर 

रग-रग में धूप समाई न 


हम वादा कर के भूल गए 

खुद से भी हुई समाई न  


क्यूँ जाते हैं उन गलियों में 

पीछे छूटीं , हुईं पराई न 


ठहरा है सूरज सर पर ही 

चन्दा की बारी आई न 


सरकी न धूप , रुका मन्जर 

आशा से हुई सगाई न 


न कोई नींद , न कोई छलाँग 

पुल सी कोई भरपाई न 


दर्द है तो है गमे-तन्हाई भी 

काँटें हैं ! क्या पैर में बिवाई न

सोमवार, 3 जनवरी 2011

इस साहिल तक आन




अमिताभ बच्चन इस सदी के सिनेमा के महानायक , शाहरुख़ खान भी इसी कड़ी में हैं , ये तो वक्त की मुट्ठी में है किस किस को शोहरत देगा । मेरे आसपास समाज में इसी सदी के नायक मिस्टर एस.पी.रावल , जिनके लिये मैंने ये कविता या कहिये ..गीत रचा , भाव जैसे ही संवेदनाएँ बनते हैं , उन्हें कविता में ढलते देर नहीं लगती ।


Mr.S.P.Rawal –Ex. Vice President Gestetner India Ltd.
Chairman Open Futures
Dr. Sujata Singh (daughter) –M.S.Phd Senior Scientist Singapore
Dr.Ranbir Singh(son-in-law) – M.S.Phd. patent to his name , Director South East Asia in one of the leading I.T. company Singapore
Dr. Avantika Nath (daughter) – Medical Director Dental in city of Sanfransisco
Dr.Rajneesh Nath (son-in-law)- M.D.Oncologist Ex. Senior Director Johnson & Johnson
Dr. Savita Singh (daughter) – M.S. Opthomology & M.D. Reumatology , owns clinic in Philedelphia
Mr. Neeraj Singh (son-in-law) – B.E. & M.B.A. Finance , Million Dollar Round Table member
Mr. Sanjay Rawal (son) – B. Com . Honours , C.O. Open Futures
Mrs. Kamakshi Rawal ( daughter-in-law) – B.A., L.L.B.


उनकी उपलब्धियों के बारे में ज्यादा न कुछ कहूंगी , हाँ २१ साल पहले उन्हें छोड़ कर इस दुनिया को अलविदा कह गईं अपनी दीदी का जिक्र इस गीत में कैसे न करूँ ? उनके अपने व्यक्तित्व और बच्चों की तरक्की की तह में उस त्यागमई स्नेहमई मूर्ति का कितना बड़ा योगदान है , ये बिना कहे भी सब जानते हैं । ३० दिसम्बर २०१० को जीजा जी के ७०वें जन्मदिन पर , जब उनकी बेटियों ने सिंगापुर अमेरिका से आ कर ,भारत में रह रहे अपने भाई भाभी के साथ मिल कर एक आकस्मिक पार्टी आयोजित की , ये गीत मैंने उसी उपलक्ष्य में रचा और कहा ...डा. अवंतिका यानि सरिता ने कमाल का प्रोग्राम एंकर किया और गुलदस्ते के सारे फूलों ने कमाल की मेजबानी की . ...



आया है महफ़िल में कोई , बन के सदी की पहचान
और आया है बन कर के , इस महफ़िल की शान

कोई कहे वो साथी मेरा , कोई कहे वो मेरी शान
अपना अपना रिश्ता ढूँढें , ऐसी है पहचान

सूरज चन्दा रुक कर देखें , उनसा ही कोई राही है
धरती पर उतरा है जो , सबको अपना मान

होते हैं इम्तिहाँ इंसाँ के ही , छोड़ जाएँ जब साथी भी
मिसाल बनी है हिम्मत ही , ले आई जो इस साहिल तक आन

प्रेरणा देता उजला चेहरा , देखो कैसी आन और शान
राहें चुप हैं बोल उठे हैं , देखो पीछे पीछे निशान

मिल बैठे हैं , सँजय , सुजाता , सरिता , सविता
कामाक्षी ,तेजस्वी और ध्रुव ; रनधीर ,रजनीश ,नीरज और
सेजल ,रोहन , रूही , रिया , रवीना ; मानव और वरुन
शुरू उसी से होकर देखो , गुलदस्ते की शान

आया है महफ़िल में कोई , बन के सदी की पहचान
और आया है बन कर के , इस महफ़िल की शान

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

हिसाब काँटों का चुकाने

छिड़ी जो बात , जख्म छेड़ गया कोई
यादों की हवाओं का रुख मोड़ गया कोई

वक्त ने अपना काम किया बखूबी तो मगर
गुजरे ज़माने की वही बात , सिरहाने छोड़ गया कोई

बिखर के सिमटे तो खुद से भी नजर चुराते ही रहे
बचे-खुचे को फिर पलट कर , उसी मुहाने छोड़ गया कोई

पीले पन्नों में गुलाबों के बहाने आ कर
हिसाब काँटों का चुकाने , सताने छोड़ गया कोई

मन के पानी पर अक्स मिटते ही नहीं
मार के कंकड़ लहरों का , शोर सुनाने छोड़ गया कोई


मैं जानती हूँ कि ये निराशा है , मगर जब गम तरन्नुम में गाने लगे तो मायूसी कहाँ बची ? यानि गम स्वीकार करते ही हम सहज होने लगते हैं , और हलचल भी तो जीवन का ही लक्षण है ।


तब न थी हाथों में कलम
जब था जहाँ अपना भी गुलशन
इसी वीराने ने थमाई है कलम

जाने हम क्या क्या लिख दें
शान में तेरी ऐ जिन्दगी
तुम लौट के आओ तो सही ...

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

सोच के दीप जला कर देखो


दूर गगन में जा कर देखो

सोच के दीप जला कर देखो


चन्दा तो उतना ही हँसी है

जितने पँख लगा कर देखो


उडती पतंगें मौजों सी ही

गीत सुहाने गा कर देखो


जीवन आनी जानी शय है

कोई तो अलख जगा कर देखो


रुत बदले , मिजाज भी बदले

वक्त से ताल मिला कर देखो


मरघट सी सूनी ख़ामोशी

क़ैद से बाहर कर देखो


बच्चे बूढ़े जवाँ हो जाते

आस का फूल खिला कर देखो


घर भर को रौशन कर देता

एक दिया ही जला कर देखो