सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

मेरे मन ने गाना सीख लिया

मेरे मन ने गाना सीख लिया
स्वप्न सरीखी दुनिया से ताल मिलाना सीख लिया

बच्चों सा ये रोता था , बच्चों सा ही चहकता था
निश्छल होकर भी निश्छल था
क्या खोना है , क्या पाना है , सुबह का तराना सीख लिया
मेरे मन ने गाना सीख लिया


बूढों सी नसीहत देता था , हर बात में अगला पिछला कर
क़दमों को पंगु कर देता
जो होगा देखा जायेगा , क़दमों ने थिरकना सीख लिया
मेरे मन ने गाना सीख लिया

लहरों का टकरा-टकरा कर , अठखेलियाँ करना देखा है
सागर से मचलना देखा है
इन रँग-बिरँगी चिड़ियों से , इन सा ही चहकना सीख लिया
मेरे मन ने गाना सीख लिया


डरते थे शक करते थे , नियमों से बंधी इस दुनिया में
नियमों को देखा करते थे
कर्मों के बही-खाते में , अपना भी तराना देख लिया
मेरे मन ने गाना सीख लिया

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

गालिब ने कहा है

गालिब ने कहा है
मौत का एक दिन मुअइयन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती
हम ये कहते हैं
सिर पे लटकी हो तलवार , अहसास हो जब उल्टी गिनती का
नींद की क्या बात है , पलक तक झपकाई नहीं जाती


जिन्दगी का जश्न मनायें कि मौत का मातम
खेल होगा तेरे लिए कठपुतली का , अपनी तो जान पे बन आती है


क्या करेगा इन चाक गरेबाँ वालों की जमात का
सूँघ लेते हैं गम हर जगह , दर्द से इनकी आशनाई नहीं जाती

सोमवार, 26 जनवरी 2009

मुझे मात दे ऐ ज़िन्दगी

मुझे मात दे ऐ ज़िन्दगी , तेरी शह पे मैं मचल सकूं
मुझे मूक राहों के बदले में, वो मुकाम दे जो बदल सकूँ

यूँ तो चाहतों का सफर भी है और राहतों का असर भी है
कोई तो हो ऐसी डगर जो ,मैं वक्त बन पकड़ सकूँ

मेरी जुस्तजू का गुजर भी है और आशना का बसर भी है
मुट्ठी में कोई बयार दे ,जो ख्याल बुन जकड़ सकूँ

यूँ तो सीढियों का चलन भी है और पीढ़ियों का गगन भी है
सहराँ में कोई खुमार दे ,कि मैं फूल बन अकड़ सकूँ


कृप्या सुनने के लिये लिंक पर क्लिक करे ( स्तुति की आवाज़ में )
http://www.box.net/shared/13tkcqxzon

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

झंकार की इक कल्पना


सुन्दर सा ला तू पाहुना
ये है मेरा उलाहना

क्यूँ भूल बैठा है हमें
कुछ भी तुझ से छुपा ना


खुश रहतें हैं भुलावों में
कैसे जियें बता ना


आहट भी जिसकी लाती है
झन्कार की इक कल्पना


कैसे बता साकार हो
यथार्थ की वो अल्पना

पलकें बिछाए बैठे हैं
दस्तक तो दे खुशबू का वो फ़साना


दिल में सजा के रख लेंगे
कुदरत का वो नजराना , आशिआना

बुधवार, 14 जनवरी 2009

दिन ढलते ही

हाँ चुराई है मैंने रिदम नाजिम नकवी साहिब की एक ग़ज़ल ' सूरज हाथ से फिसल गया है , आज का दिन भी निकल गया है ' की | रिदम को शायद लय या ताल कहते हैं | और चुराई है गजल के पहले शेर की सोच | ग़ज़ल थोड़ी उदास बन पड़ी है | चाहती तो मैं भी हूँ ; सबेरे , पुरवाई और चहकने की बातें लिखूं | जो इस रंग से न गुजरा , उस रंग की अहमियत क्या जाने | तन्हाई में एक तड़प की गूँज होती है और हर मिलन में एक किलकारी होती है | खैर ग़ज़ल हाजिर है |

दिन ढलते ही , अहसास आया

आज भी सूरज गुजर गया है


मेरी तरह वो भी तन्हाँ है

आग है इतनी , पिघल गया है


बहके क़दमों , मय को कोसे

हसरत सारी निगल गया है


छूटा निवाला , वक़्त के हाथों

ख्वाब तो सारा बिखर गया है


दिन दिन कर ये ,इक युग बीता

जीवन हाथ से फिसल गया है


आस सँजोये , रोज नई सी

सफर आसमाँ के निकल गया है

सोमवार, 12 जनवरी 2009

गाते हैं तेरे हौसले

गाते हैं तेरे हौसले

गाता है धरती आसमान

गाते हैं तेरे मन प्राण

बोलती है आँखों की जुबान


माहौल में रचे बसे

मन की तहें खोलते

अबीर और हिना की तरह

रँग छोड़ते निशान


एक सिरा तेरे हाथ है

दूसरा आँधियों के पार

सूरज को मात देती

हौसले की ये मुस्कान


गाते हैं तेरे हौसले
गाता है धरती आसमान

धरती गगन को नापती

तेरे पँखों की उड़ान

बुधवार, 7 जनवरी 2009

तन्हाईयों से पूछा

मैंने तन्हाईयों से पूछा अक्सर

क्यों मेरे घर का पता है याद तुम्हें

कस के पकड़ा है मेरा हाथ

मैंने जब जब भुलाया है तुम्हें


जो डेरा डाले हो तुम

कैसे आयेगा जशने मुहब्बत

मेरे घर , मेरे पास कहो


सर माथे से लगाये हूँ तुम्हें

घर आये की मेहमाँ नवाज़ी

कर लूँ , तो चलूँ


तेरे लिए भी सजी है महफ़िल

तेरे हर गीत को मैंने

सीने से लगा , गुनगुनाया है