मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

इक ख़्वाब जरुरी है

खूबसूरती देखने के लिये , वो आँख जरूरी है 
दिल तक उतरने के लिये ,इक आब जरुरी है 

दम भरता है क़दमों में जो 
रँग भरने के लिये , इक ख़्वाब जरुरी है 

जाने कहाँ ले जाये हमें 
मंजिले-मक्सद के लिये ,  दिले-बेताब जरुरी है 

कितने ही मन्जर रोकें क़दमों को 
राहे-वफ़ा के लिये , असबाब जरूरी है 

सवाल-दर-सवाल है ज़िन्दगी गर 
ज़िन्दगी के लिये , ज़िन्दगी सा जवाब जरुरी है 

कहने को चल रहे हैं जुगनुओं के शहर में 
सहर के लिये मगर , आफ़ताब जरुरी है 

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

ये जनम तो तन्हाई के नाम

ज़िन्दगी कुछ यूँ भी गुजरी 
हाथ और प्याले की दूरी मीलों लगी 

उसको चलना ही नहीं था साथ 
बात कहने में इक उम्र लगी 

चाहने भर से क्या होता 
ना-मन्जूरी की ही मुहर लगी 

ये जनम तो तन्हाई के नाम 
समझने में बहुत देर लगी 

हाथ में कुछ भी नहीं है 
माथे पे शिकन ही शिकन लगी 

गर ताजमहल नहीं है किस्मत में मेरी 
खाकसारी भी मुझे न्यारी ही लगी 

सजा ही है ईनाम गर तो 
दाँव पर उम्र सारी ही लगी 


सोमवार, 25 मार्च 2013

ऐसी तलब

तुम हो न सके मेरे 
दुनिया की ख्वाहिशों से मेरा काम क्या 
दिल से दिल को जो मिलाये 
ऐसी तलब का है भला दाम क्या 

हम तो डूबे हैं वहीँ पर 
उथले किनारों पर भला वफ़ा का काम क्या 
चलें तो चलें कैसे 
वो मेंहदी , वो महावर का भला सा नाम क्या 

वक़्त की कोई चाल सूरज के साथ मिली 
भरी दुपहरी में और घाम क्या 
चाहने किस को चले हैं 
इश्क की नगरी में किसी को आराम क्या 

अश्कों से लिखी दास्तान , परवाह किसे है 
इस अहले-सफ़र का हो अन्जाम क्या 

मंगलवार, 12 मार्च 2013

दिन की अहमियत

रात का मुँह देखा तो जानी दिन की अहमियत 
दिल जला कर ही सही , कलम की रौशनाई हुई 

लहरें ही तो होती हैं शान समन्दर की 
ज़िन्दा हैं तो हलचल है , वरना मुर्दों की बस्ती हुई 

रग-रग में समाया है अरमाँ बन कर 
ज़ुदा करते नहीं बनता , खूं जैसी पहचान हुई 

पकड़ लेता है कलम जब-जब समन्दर 
बह जाता है हर कोई , बौनों सी हस्ती हुई 

ज़िन्दगी होती है सहरा के किनारों में भी 
नमी सारी तप कर , सूरज की नजर हुई 

रविवार, 3 मार्च 2013

बुझ-बुझ के जले


वो दिओं सी जलती आँखें , करें इन्तिज़ार किसी का 
कौन जाने बुझ-बुझ के जले , जिया बेकरार किसी का 

हाले-दिल किस को सुनाएँ 
क्यूँ दिल है सोगवार किसी का 

रँग चाहत के भर तो लेते हम भी 
हासिल न हुआ इकरार किसी का 

हाथ लगते ही बहार आ जाती 
तमन्नाओं ये नहीं रोज़गार किसी का 

नरगिसी बातों में फिसल तो जाते हैं 
चमन में क्या है ऐतबार किसी का 

वो दिओं सी जलती आँखें , करें इन्तिज़ार किसी का 
कौन जाने बुझ-बुझ के जला है जिया बेकरार किसी का 

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

विष्वास को पानी देना

मेरे विष्वास को पानी देना 
अरमान को चुनर धानी देना 

ज़िन्दगी कुछ भी नहीं , मुहब्बत के बिना 
मेरे अलफ़ाज़ को कहानी देना 

जिधर भी देखूँ तुम ही तुम हो 
अहसास को हकीकत ज़मीनी देना 

कहीं न कहीं तो हो तुम 
मेरी आस को ज़िन्दगानी देना 

गुजर गये हैं मौसम कितने ही 
देरी ही सही , बहारों को रवानी देना 

शबे-इन्तिज़ार का कोई तो सिला 
सुबह हर हाल निशानी देना 

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

सत्रह-अठरह का इश्क ,

वैलेन्टाइन-डे की नजर

 सत्रह-अठरह का इश्क , होता है नासमझ 
 रूहानी सी प्यास , दीवानगी की वो हद 

चाँद खिलौने की ज़िद 
डगर से बेखबर , नाजुक कन्धों पे रखना न बोझ रे 


 सत्रह-अठरह का इश्क , होता है नासमझ 
 रूहानी सी प्यास , दीवानगी की वो हद 

कस्तूरी सी महक 
और टीसती कसक , दिल का कोना है बहुत उदास रे 


 सत्रह-अठरह का इश्क , होता है नासमझ 
 रूहानी सी प्यास , दीवानगी की वो हद 

उम्र भर का है रोग 
दुनिया है बेरहम , आतिशे-गुल का है क्या काम रे 


 सत्रह-अठरह का इश्क , होता है नासमझ 
 रूहानी सी प्यास , दीवानगी की वो हद 

कर खुद पर करम 
घर फूँक या दिल फूँक , तमाशे का है क्या अन्जाम रे 


 सत्रह-अठरह का इश्क , होता है नासमझ 
 रूहानी सी प्यास , दीवानगी की वो हद 

तू ऊँचा उठे 
नापे धरती-गगन , क़दमों में बेड़ियों का है क्या काम रे 


 सत्रह-अठरह का इश्क , होता है नासमझ 
 रूहानी सी प्यास , दीवानगी की वो हद