गुरुवार, 14 अप्रैल 2011
कोई अब तक खड़ा है
तुम्हारा इन्तिज़ार अब तक हरा है
सूखी नहीं हैं टहनियाँ कोई अब तक खड़ा है
मौसम कई आए गए किसको पता
कोई अब तक तन्हा बड़ा है
मत बताना नहीं आयेगी कोई चिट्ठी
इतनी सी खबर में भी तूफ़ान बड़ा है
लम्हा लम्हा रौशन हैं बहारें देखो
ज़िन्दगी ये भी तेरा अहसान बड़ा है
चन्दा भी रातों को जगा है
रोज घटता बढ़ता अरमान बड़ा है
कोपलें खिल न सकीं मौसम की मेहरबानी से
धरती के सीने में अहसास बड़ा है
वफ़ा ज़फ़ा एक ही सिक्के के दो पहलू
सगा नहीं है कोई फिर भी विष्वास बड़ा है
टंगा हुआ है कोई आसमाँ के पहलू में
वजह कोई न थी तो क्यूँ किस्मत से लड़ा है
गुरुवार, 31 मार्च 2011
आशिक का ही मुहँ देखा किये
शेरों और गजलों में हम जिन्दा रहे
हर कदम पर खाई थी रुसवाई थी
गिर गिर कर उठे हम डूबते उतराते रहे
जवाकुसुमों का अपना क्या रँग और क्या है महक
अपनी खुशबू से बेखबर उड़ते रहे खोते रहे
बेलों का अपना है क्या वजूद
तनों से लिपटे रहे सहारे को लड़खड़ाते रहे
उसके चेहरे का रँग ही सजता रहा
अपनी तन्हाईयों से हम घबराते रहे
जिन्दगी भर आशिक का ही मुहँ देखा किये
शेरों और गजलों में हम जिन्दा रहे
यहाँ क्लिक कर के मेरी आवाज में सुन सकते हैं .....
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शुक्रवार, 25 मार्च 2011
सिपह-सालार नहीं हिलता
गैर के खेमे में
अपना कोई वश नहीं चलता
हजार बातेँ हैं
दिल कहीं नहीं लगता
नन्हा कोई पौधा
मिट्टी की कोख में पलता
अच्छे होने की निशानी क्या है
साथ कोई नहीं चलता
साथ चलने से दब जाएगा वजूद
अना का कोई किनारा नहीं मिलता
इम्तिहान है ज़िन्दगी
नतीजा कुछ भी मिलता
हौसला है तो जँग जीती सी
इसी दम पे सिपह-सालार नहीं हिलता
बुधवार, 16 मार्च 2011
मनुवा की समझो बोली है
होली है होली है , रँगों की हमजोली है
ढोल नगाड़े मस्त बजाओ , मनुवा की समझो बोली है
टेसू फूले फागुन बोले , अमुवा के बौरों से खेले
रँगों की चादर ओढ़ाओ , ऋतुओं की आई डोली है
रँग गुलाल है होली का , और दुलार है गालों का
भीगा आँचल भीगा तन मन , भीगा लहँगा चोली है
हाथ रँगे है रँगा है जीवन , रस से देखो पगा है जीवन
एक दुकान है मीठे की , साली भी मुहँ-बोली है
देवर-भाभी साली-जीजा , रिश्ते-नाते प्यार भरे
सखी सहेली यार मिले , बात-बात में हँसी-ठिठोली है
गीत प्रीत की धुन पर नाचो , साँसों की सरगम पर नाचो
हाथ पकड़ कर दम भर नाचो , आई मस्तों की टोली है
होली है होली है , रँगों की हमजोली है
ढोल नगाड़े मस्त बजाओ , मनुवा की समझो बोली है
बुधवार, 2 मार्च 2011
ऐसे उठते हैं लोग दिलों से
इस मेज से उठ कर , उस मेज पे जा बैठे हों
कब लगती है देर परिन्दों को उड़ने में
आसमान की बाहें हैं , साथी मगर चुप बैठे हैं
पल-लम्हें सब दम साधे हैं , कैसे बोलें
शोर भरे जब दूर दूर से , मन बैठे हों
कैसे कह दें महज इत्तफाक है जिन्दगी
कभी किस्मत का इन्साफ कभी मर्जी का सिला ले बैठे हैं
मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011
लय लागी है किस से अन्दर
लाख सीपियाँ मोती अन्दर
फिर भी प्यासा क्यों है समन्दर
अपने जैसा ढूँढ रहा है
नट है या फिर कोई बन्दर
मत भोंको सीने में खन्जर
टूटे लम्हे , रूठा पिन्जर
कितनी बातेँ बदल गईं हैं
कहाँ रुका है कोई मन्जर
कौन मुक्कद्दर का है सिकन्दर
क्या तुमने देखा न कलन्दर
बेगाना सा इस दुनिया से
लय लागी है किस से अन्दर
रविवार, 30 जनवरी 2011
मिट्टी हूँ , ख़्वाबों में महक जाऊँगी
कच्ची मिट्टी हूँ , तराश लो
प्याला-ए-मीना या सागरो-सुराही की तरह
अजब सी बात है , उदास है जो पीता है
रंज का जश्न मनाने की तरह
बात सीधी सी है , चाहिए बस एक नजर
रहमत की इनायत की तरह
बूँद वही चखने को , वक्त रुका बैठा है
शबे-गम की ठहरी हुई सहर की तरह
ज़र्रा-ज़र्रा उधड़ गया अपना
इक नई शक्ल में ढलने की तरह
मिट्टी हूँ , ख़्वाबों में महक जाऊँगी
बचपन के नन्हें घरौंदों की तरह

