रविवार, 19 जुलाई 2015

हम तेरे शहर से चले जायेंगे

इतने साल इस शहर में बिता कर अब जाने का वक्त हो चला है , सँगी-साथियों से बिछड़ने का वक़्त …

हम तेरे शहर से चले जायेंगे 
कितना भी पुकारोगे , नजर न आयेंगे 

अभी तो वक़्त है , मिल लो हमसे दो-चार बार और 
फिर ये चौबारे मेरे , मुँह चिढ़ायेंगे 

भूल जाना जो कभी , दिल दुखाया हो मैंने तेरा 
इतने अपने हो , गैर की तरह क्यों दिल दुखायेंगे 

धूप ही धूप रही , सफर में अपने बेशक 
छाया तेरी भी कभी , हम न भूल पायेंगे 

ये दुनिया आबाद रही हमेशा , दोस्ती के रँगों में 
महफिले-यारों की सँगत , कहो किधर से लायेंगे 

बुधवार, 17 जून 2015

तू जिसे ढूँढ रहा है

तू जिसे ढूँढ रहा है , वो तो इश्क है हक़ीकी 
दुनिया की महफ़िलों में , मिलता है वो रिवाजी 

ज़माने की आँधियों में , रहना है तुझे साबुत 
मिले न भले कुछ भी , हर हाल में हो राजी 

ज़िन्दगी का है ये मेला , चाहे तो चल अकेला 
चाहे तो सजदा कर ले , चाहे तो रख नाराज़ी 

मिलती नहीं है दुनिया तो , लगती है भले सोना 
मिल जाये तो माटी है , प्राणों की लगे बाज़ी 

चल-चल के जो तू हारे , चारों तरफ निहारे 
रूहों का शहर है ये , रिश्तों की है मोहताजी 

माने तो दुनिया सहरा , माने तो दुनिया महफ़िल 
फ़ानी है सारी दुनिया , कोरी है ये लफ़्फ़ाज़ी 

सच्चा ही तू रह खुद से , इतना भी तो है काफ़ी 
आयेगा सब ही आगे , छोड़ेगा कहाँ माज़ी 

बुलबुलों सा फ़ना होता , ज़द्दो-जहद की खातिर 
सागर से कब मिलेगा , नजरों में रख अजीजी 


मंगलवार, 2 जून 2015

हाल अपना क्यूँ सुनाएँ

लम्हों ने कीं ख़ताएँ 
सदियों ने पाईं सजाएँ 

सहर सी खिलीं फिज़ाएँ 
मरघट सी सूनीं खिज़ाएँ 

लफ़्ज़ों में क्या बताएँ 
हाल अपना क्यूँ सुनाएँ 

फूलों को जो दिखाएँ 
काँटों पे चल बताएँ 

ज़िन्दगी की हैं अदाएँ 
सहरां में फूल खिलाएँ 

बर्फ सी ठण्डी शिलाएँ 
चिन्गारी किस को दिखाएँ 

मंगलवार, 12 मई 2015

बगावत भी नहीं

उठते हैं दुआओं में जब हाथ मेरे 
लब हिलते ही नहीं 

टूटा है भरोसा मेरा 
अल्फ़ाज़ निकलते ही नहीं 

पड़ गये छाले हैं 
चला जाता ही नहीं 

है कैसा सफर ये 
सूलियाँ दिखती ही नहीं 

और जाऊँ भी किधर 
रूह का शहर मिलता ही नहीं 

नहीं बनना है तमाशा मुझको 
साबुत हूँ , आँख में पानी भी नहीं 

एक धीमा सा जहर उतरा है 
मेरी रगों में , बगावत भी नहीं 

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

दौड़े बहुत हो

आँतक-वाद की रोकथाम कैसे हो .....

बदले के बदले चलते रहेंगे 
खुदा बन के खुद को छलते रहेंगे 

थोक में बिछी लाशें , क्या सुख है पाया 
जो भी गया है ,लौट के न आया 
जख्मीं हैं सीने तो , मरहम लगाओ 
गूँजती सदाओं को , न तुम भुलाओ 
कब तक यूँ ख़्वाबों को मसलते रहेंगे 

कराहता है कोई , नजर न चुराओ 
सीने में उसको , न यूँ तुम दबाओ 
बहुत दिन हुए हैं , तुम्हें मुस्कराये 
दौड़े बहुत हो , नहीं पता पाये 
सहरा में कब तक भटकते रहेंगे 

बदले के बदले चलते रहेंगे 
खुदा बन के खुद को छलते रहेंगे 




रविवार, 29 मार्च 2015

हम सब हैं किताब

हम सब हैं किताब , पढ़ने वाला न मिला 
या खुदा ऐसा भी कोई ,चाहने वाला न मिला 

हाथ में हाथ लिये चलते रहे हम यूँ ही 
दूर तक कोई भी साथ निभाने वाला न मिला 

चलती रहती है सारी दुनिया यूँ तो दिल से 
फिर भी कोई पलकों पे बिठाने वाला न मिला 

गुनगुनाने के लिये चाहिये कोई तो फिजाँ 
वफ़ा के गीत कोई भी सुनाने वाला न मिला 

चाहिये ज़िन्दगी को कोई न कोई तो वजह 
बहाना कोई भी हमको चलाने वाला न मिला 

मंगलवार, 17 मार्च 2015

होली में मन रँग बैठी है

व्यस्तता की वजह से होली पर लिखा गीत होली के मौके पर पोस्ट नहीं कर पाई  ....

आँखें मलती उठ बैठी है , होली में मन रँग बैठी है 
एक उजास है अँगना में , चूनर अपनी रँग बैठी है 

सरक-सरक जाये है चुनरी ,गोरी खुद हल्कान हुई है 
दूर खड़े हैं कान्हा तब से , राधा जैसे मगन बैठी है 

हाथ गुलाल रँग पिचकारी , गुब्बारे भी दे-दे मारे 
बच्चे-बड़े हँसें किलकारी भर-भर,उम्र तो अल्हड़ बन बैठी है 

ले आया फागुन बौराई , मन को मिले ठाँव कोई न 
आँगन-आँगन रँग बरसे , उत्सव से भी ठन बैठी है 

भाँग-धतूरा नशा नहीं है , गले मिले बिन मजा नहीं है 
सिर चढ़ कर बोले ये जादू , होली-होली मगन बैठी है 

मीठी-मीठी तकरारों में , लाग-लपेट की मनुहारों में 
मौज-मस्ती की आड़ में देखो , रिश्तों की गरिमा बैठी है