सोमवार, 29 जुलाई 2019

वक़्त हमें क्या देगा

वक़्त हमें क्या देगा 
क्या किस्मत जो बदल देगा 

वीरानियों ने पूछा है 
क्या कोई गुमाँ है जो बचपन देगा 

जहान तो है इक बाज़ार ही 
खोटे सिक्के सा तुझे पलट देगा 

दर्द जैसे जागता है हर सीजन 
चोट को कोई क्या भुला देगा 

वो मेरी जड़ें खोद रहा है 
ये गम ही मुझे कज़ा देगा 

बड़ी मामूली सी हैं ख्वाहिशें मेरी 
आसमान मुझे कोई क्या देगा 

वक़्त से भिड़ जाना आसान नहीं है 
फ़ना होगा या सँवर जायेगा ,
देखा जायेगा जो भी बदा होगा 

कज़ा -मौत


सोमवार, 1 जुलाई 2019

इज़हार

प्यार इज़हार माँगता है ,
और बार बार माँगता है 
जीने की वजह बनता है ,
इसीलिए तो इकरार माँगता है 

ख़ुशी भी छलकती है , 
और ग़म भी झलकता है 
वो जो आँखों से बयाँ होता है , 
दिल वही सुनने को तरसता है 

तुम जो हो आस पास तो , 
हम हो जाते हैं बेफिक्रे 
दिल के टुकड़ों को कोई कैसे समझाये 
दिल हो साबुत तब ही तो धड़कता है 




रविवार, 30 सितंबर 2018

इन्तिहाँ कर ले

उठ रे मन कोई सुबह कर ले 
आतिशे-ग़म की इन्तिहाँ कर ले 
यूँ ही नहीं चल सकेगा आगे 
माथे में कोई उजाला भर ले 

राहें अँधेरी , दिन भी अँधेरे 
कैसे निभेंगे सुब्हो-शाम के फेरे 
कोई न कोई तो भुगतान होगा 
तू भी गम से किनारा कर ले 

जां पे रखेगा जो पत्थर कोई 
मुर्दा नहीं है हलचल तो होगी 
नदिया के पार किनारा कर ले 
तिनके का ही सहारा कर ले 

बुधवार, 11 जुलाई 2018

आया है एक मेहमाँ

I wrote this for my son inlaw for the wedding day...
आया है एक मेहमाँ
जादू सा कोई अरमाँ
साँसों ने छेड़ी सरगम
खिला दिल का यूँ गुलिस्ताँ

रँगों ने हवाओं में इक शय सी मिला दी है
और फिज़ाओं ने महफिल भी सजा ली है
सीने में धड़कता दिल ,आँखों को मिली जुबाँ
आया है एक मेहमाँ

गालों की रंगत ने हर बात बता दी है
बस एक पिया की गली ,फूलों को दिखा दी है
अरमान जगे हों जब ,महफिल है सारी जवाँ
आया है एक मेहमाँ

घोड़ी पर आओगे अरमानों की गलियों में
दुल्हन ने हाथों में, मेहँदी भी रचा ली है
सेहरे की लड़ियों ने मुस्कान दिखा दी है
महके हैं सारे दिल, महका है सारा समाँ
आया है एक मेहमाँ

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

इम्तिहान भी तय है

मान-अपमान भी तय है ,वितृष्णा भरी आँख का सामान भी तय है 
न भटकना ऐ दिल , तुझको सहना है जो वो तूफ़ान भी तय है 

न राहों से गिला , न कश्ती से शिकायत मुझको 
तूफानों के समन्दर में , मेरा इम्तिहान भी तय है 

डूबेंगे कि लग पायेंगे किनारे से हम  
है किसको पता ,मगर अपना अन्जाम भी तय है 

मत बाँध इन किनारों में ऐ खुदा मुझको 
मंजिल-ऐ-मक़्सद के लिये , रूहे-सुकून का अरमान भी तय है 

थोड़ी धूप , थोड़ी छाँव ओढ़ कर घर से निकले 
सफर में जो सामान बटोरा , सर पे बोझ से ढलान भी तय है 

सोमवार, 14 अगस्त 2017

जन्माष्टमी पर

आज फुर्सत में हूँ मैं ,कहाँ हो बोलो प्यारे 
तुमसे हैं बातें करनी,आ जाओ कान्हा प्यारे    

सदियों से देखें रस्ता ,ये आँखें जागी-जागी 
राह में ऐसे लगीं हैं , जैसे हों कोई अभागी 
मुरली की तान सुनाने ,कुछ मेरी भी सुन जाने 
आ जाओ कान्हा प्यारे 

गये तुम कौन गली हो ,तुम्हारे बिन हैं अधूरे 
श्याम तुम अन्तर्यामी ,दूर क्यों खड़े निहारो 
चल रहे सँग हमारे , सदा तुम बाहें थामे 
आ जाओ कान्हा प्यारे 

पहाड़ टूटा तो नहीं है ,नहीं है शिकायत करनी 
किसमें है मेरी भलाई ,प्रभु तू बेहतर जाने 
मगर मुझको आजमाने , फिर इक बार मुझे समझाने 
आ जाओ कान्हा प्यारे  

आज फुर्सत में हूँ मैं ,कहाँ हो बोलो प्यारे 
तुमसे हैं बातें करनी,आ जाओ कान्हा प्यारे 



गुरुवार, 27 जुलाई 2017

किसी आँच का धुआँ

ये मेरे साथ चल रहा है किसी आँच का धुआँ 
इतनी बदली हुई फ़िज़ाँ है के होशो-हवास में नहीं है समां 

ऐ वक़्त , इस ज़िल्लत का शुक्रिया ,
ये पीड़ा जो मुझे ले आई है कसक के इस मुकाम तक 
सिखा गई है जीना , टूट जाने तलक 

ज़िन्दगी ने बड़ी भारी कीमत माँगी है 
जो राह पहुँचाती है ज़िन्दगी तक , उसकी ही आहुति माँगी है 

चेहरों के पीछे का सच ,ये तुझको होगा मालूम 
मैंने नियति के आगे घुटने नहीं टेके 
सिर्फ नियति से लय मिलाने की कोशिश की है