रविवार, 4 जनवरी 2009

अपने जैसे दिलों को दिल पहचान लेता है


दिल में जगह रख कर मिलते हैं फ़िर भी
क्यों साथ चलना इन्हें गवारा नहीं होता
आड़े आ जाती है आन , बान और शान
जिसका खोना या कम होना , इन्हें गवारा नहीं होता
_अपने जैसे दिलों को दिल पहचान लेता है
बड़ी मुश्किल से राहें साथ चलती हैं
राहों को सजा ले तू , राहों का ठिकाना नहीं होता
_वो जो जन्मों से प्यासे हैं
समा जाते हैं जानों में , राहों की रज़ा बनकर
रज़ाओं का ठिकाना नहीं होता
_मुसाफिरी है तेरी भी मेरी भी
हाथों में पकड़ ले हाथ , झूठे आसरे , आडम्बर
सहारों का भरोसा नहीं होता
अपने जैसे दिलों को दिल पहचान लेता है

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

चाँद उगा आसमान में

चाँद उगा आसमान में
मौसम सारा निखरा आया
मुट्ठी भर रोशनी लेकर
चाँदी-चाँदी बिखरा आया

उछलें हैं लहरें , मिलने को
सागर में यूँ तूफ़ान आया
टूटें न किनारे अरमाँ के
ऐसे ही ये मेहमान आया

दल-बल अपने साथ लिये
तारों की थाली भर लाया
चमकें हैं सितारे आंखों में
साजिश ये कैसी कर लाया

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

हवाओं से हवा देती है

जिन्दगी रोज दवा देती है
दुखती रगों को हौले से हिला देती है

तन जाते हैं जब तार मन के
कैसी कैसी तानों को बजा देती है

ज़िन्दगी हो रूठी सजनी जैसे
तिरछी निगाहों से इम्तिहान लेती है

जगते बुझते हौसलों को
हवाओं से हवा देती है

कड़वे घूँटों सी दवाई उसकी
माँ की घुट्टी , घुड़की सा असर देती है

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

आजाओ मेरे प्रभु जी (गुरु जी )

उतरो मेरे मन में , प्रभु जी
उजली सी किरणें लेकर
तकती हैं मेरी आँखें
भूली हैं सारी राहें
अन्तस में है अँधियारा
दिखता न कोई किनारा
जन्मों से बहका तन मन
जलने को है इक उपवन
आजाओ मेरे प्रभु जी
ठंडी सी हवाएं लेकर
तेरी ठण्डक देती बाहें
राहत की सारी दवाएँ
महकेगा इक गलियारा
खिल जायेगा इक उजियारा
जिस ओर भी तुम लेजाओ
उंगली अपनी पकड़ाओ

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

बातों में नमी रखना

बातों में नमी रखना
आहों में दुआ रखना
तेरे मेरे चलने को
इक ऐसा जहाँ रखना

जूते तो मखमली हैं
चुभ जायेंगे फ़िर काँटें
जो अपने ही बोए हैं
छाले न पड़ जाएँ
चलने को जँमीं रखना

चलना है धरती पर
हो जायेगी मूक जुबाँ
मुस्कानों पे फूल लगा
पँखों में दम भरके
सबकी ही जगह रखना

बच्चों सा निश्छल हो
पुकारों में वो चाहत हो
आसमानों में बैठा जो
उतरने को आतुर हो
अन्तस को सजा रखना

ये कौन झुक -झुक के देखे

ये कौन झुक -झुक के देखे
मन के रंगों की कितनी चमक है
हम तो चलते हैं उसके सहारे
वो जो झुक-झुक के हमको निहारे

झलक तो वो अपनी ही पाता
मेरे संग-संग कदम वो बढ़ाता
थाप उसके ही क़दमों की है
मेरे मन में जो लेती हिलोरें

खुशबू की वो डाली सजाता
बैठ उस पर वो उसको हिलाता
फूल कलियाँ जो उसने बिखेरे
मेरे चेहरे ने वही रंग उकेरे

वो तो बैठा है मन में ही छुप के
रुक रुक के वो करता इशारे
घुँघरू उसके ही खनकाए हैं
माहौल में जो थिरकन उतारें