कोई शुबहा कहीं नहीं है
रात हुई और तारे निकले
अरमाँ की गलियों में यूँ ही
हम अपना दिल हारे निकले
कोई मंजिल कहीं नहीं है
टूट के बिखरे सितारे निकले
बाँध सके जो हमको देखो
झूठे सारे सहारे निकले
अपनी चादर में फूलों के
काँटों से ही धारे निकले
डूबें कैसे बीच भँवर में
दूर बहुत ही किनारे निकले
उँगली पकड़ेंगे वो अपनी
ऐतबार के मारे निकले
पराई धड़कन , पराई साँसें
क्या-क्या पास हमारे निकले
मंगलवार, 21 सितंबर 2010
क्या-क्या पास हमारे निकले
सोमवार, 13 सितंबर 2010
दम बड़ा लगता है
इसे जरा ' प्यार का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है ' की तर्ज पर गुनगुनाएँ ...
उधड़े रिश्ते सिलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है
उलझ गए हैं मन के धागे
सुलझाने में , रेशमी गाँठें फिर खुलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है
बिखर गए जो अरमाँ अपने
उजड़ी बस्ती , वीराने को फिर बसने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है
प्यार का पहला ख़त ये नहीं है
बिखरी उमंगें , फिर चुनने में दम बड़ा लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है
उधड़े रिश्ते सिलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है
रविवार, 5 सितंबर 2010
छूटे न अपनी आस का झाला
कैसे मैं पी लूँ फिर हाला
यहाँ नहीं है कोई मीरा
और नहीं है कृष्ण रखवाला
दुख की रात बहुत लम्बी है
और पड़ा है जुबाँ पे ताला
किसने अपना धर्म है छोड़ा
सूरज ,चन्दा ,गगन मतवाला
हम भी आये हैं मन रँग कर
और ओढ़ कर एक दुशाला
जोग ,रोग ,सोग भोग कर
छूटे न अपनी आस का झाला
प्यास सभी को उसी घूँट की
जैसे जीवन हो मधुशाला
शनिवार, 28 अगस्त 2010
जब भी लय छूटे
ताल मिलाती लय भी चलेगी कब तक
हड्डियों में रच बस गया है जो
धुआँ वजूद का हिस्सा है तपेगा कब तक
तन ने कहा ही नहीं मन ने जिया जिसको
कलम के जिम्मे ये सफ़र बतलाओ कब तक
हदें मिटती हैं तो सरहदें टूटती हैं
खानाबदोशों की तरह गम खायेगा कब तक
खुशबुएँ दूर से ही लगतीं अच्छी
ख्यालों में तितलियों को पकड़ पायेगा कब तक
तान टूटे जब भी लय छूटे
जिन्दगी गीत है हर हाल में मुस्कराएगा कब तक
कलम की जगह किसी किसी के लिये अश्कों के जिम्मे भी हो सकता है ये सफ़र !
गुरुवार, 19 अगस्त 2010
चुप से दिखाने के लिये
कर रहा इन्कार आँसू भी , आँख में आने के लिये
चुक गया दरिया भी , आतिशे-गम बुझाने के लिये
हो गये हैं ढीठ से , चुप से दिखाने के लिये
मार कर पत्थर तो देखो , हमको हिलाने के लिये
सैय्याद ने ले लिये पर , गिरवी दिखाने के लिये
उम्मीद पर चलते रहो , बेपरों के हौसले आजमाने के लिये
रख छोड़े थे ताक पर , कितने ही नगमे भुलाने के लिये
पिटारी खोल कर बैठे हैं , वही लम्हे भुनाने के लिये
चुक गया दरिया भी , आतिशे-गम बुझाने के लिये
हो गये हैं ढीठ से , चुप से दिखाने के लिये
मार कर पत्थर तो देखो , हमको हिलाने के लिये
सैय्याद ने ले लिये पर , गिरवी दिखाने के लिये
उम्मीद पर चलते रहो , बेपरों के हौसले आजमाने के लिये
रख छोड़े थे ताक पर , कितने ही नगमे भुलाने के लिये
पिटारी खोल कर बैठे हैं , वही लम्हे भुनाने के लिये
लौट आये हैं वही दिन रात , हमको सताने के लिये
पुराने फिर वही किस्से , दिले-नादाँ दुखाने के लिये
घड़ों पानी तो डाला था , जख्मे-दिल सहलाने के लिये
गढ़े मुर्दे छेड़े किसने , चिंगारी यूँ सुलगाने के लिये
शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
कदम जमा जमा कर
न जाने कौन सी लहर हो तूफाँ से हाथ मिलाये हुए
किसी को पँख मिले हैं परवाज़ के लिये
किन्हीं क़दमों को सरकने की गर्मी भी न नसीब हुए
कोई चढ़ रहा है कामयाबी की सीढ़ियाँ
कोई दामन में है बिखरे अहसास सम्भाले हुए
कहीं जमीन कम , है कहीं आसमान कम
इसी हेरफेर में जाने कितने हैं धराशाई हुए
हवाएँ हैं , चिराग है , है नमी कम
सूखे में हौसले भी हैं भरमाये हुए
जाने वो कौन सी सहर है या लहर
बीच भँवर में कश्ती को आजमाये हुए
बुधवार, 4 अगस्त 2010
ख्याल जिन्दा है
बुत बने बैठे हैं मगर जिन्दा हैं
झाँक के देखा है अन्दर कोई शर्मिन्दा है
भलमन-साहत को नासमझी समझ लेते हैं लोग
भटकना मुश्किल है जमीर जिन्दा है
उठ गया कारवाँ साथ हसरतों के ही
सो गया सब कुछ गुबार जिन्दा है
घड़ी की तरह चलती हैं धडकनें
रुकी नहीं हैं सामान जिन्दा है
मन्दिर-मस्जिद भी गए , वो बोलता ही नहीं
ज़माने में मगर उसका करम जिन्दा है
कहाँ से लाऊँ बुतों की बस्ती में खुदा
तलाश जारी है , ख्याल जिन्दा है
झाँक के देखा है अन्दर कोई शर्मिन्दा है
भलमन-साहत को नासमझी समझ लेते हैं लोग
भटकना मुश्किल है जमीर जिन्दा है
उठ गया कारवाँ साथ हसरतों के ही
सो गया सब कुछ गुबार जिन्दा है
घड़ी की तरह चलती हैं धडकनें
रुकी नहीं हैं सामान जिन्दा है
मन्दिर-मस्जिद भी गए , वो बोलता ही नहीं
ज़माने में मगर उसका करम जिन्दा है
कहाँ से लाऊँ बुतों की बस्ती में खुदा
तलाश जारी है , ख्याल जिन्दा है
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