हर आहट को समझा उसका पैगाम
हर मन्जर को किया मैंने सलाम
कितने ही पिये उम्मीद के जाम
कैसी है आहट , कैसे अन्जाम
अँगना में ठहरी है वो ही शाम
कोई सुबह क्या नहीं मेरे नाम
चलता है वही जो हमको थाम
वही अपनी डोरी वही गुलफाम
रँग देखे दुनिया के अजब अनाम
ख़्वाबों-ख्यालों की दुनिया तो ...नहीं इसका नाम , नहीं इसका नाम !
गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010
नहीं इसका नाम !
सोमवार, 11 अक्टूबर 2010
कितने साबुत और बचा क्या
दूर तू है तेरा साथ जिऊँ क्या
तू तन्हा दिन रात चला है
तेरी पीड़ है मुझसे जुदा क्या
मेरी आँख का आँसू चुप है
और भला खामोश सदा क्या
साथ साथ चलते हैं हम तुम
कितने साबुत और बचा क्या
तेरी मुसाफिरी बनी रहे
मेरा क्या है माँगूं क्या
मेरे गीतों में तू ही तू
ऐसा अपना नेह है क्या
दूर से दिखते मिलते हुए
धरती-अम्बर कभी मिले हैं क्या
पी लूँ चाँदनी चुल्लू भर
सफ़र में थोड़ा आराम क्या
सहराँ भी ले लेता दम-ख़म
तू भी बता, तेरी मर्जी क्या
मेरी आवाज में सुन सकते हैं _
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सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
हसरतों की देहरी पर
पाँव रखना सोच कर
है कहाँ आसान इतना
आना अपना लौट कर
है बहुत मगरूर इंसाँ
दिल लगाना सोच कर
लग गया जो दिल तो फिर
निभाना सीना ठोक कर
बेवफा निकलें जो सपनें
ये भी रखना सोच कर
होगा कहाँ अपना ठिकाना
खुद को पूछो रोक कर
मन्जर भी हैं मंजिल ही
देखो तो ये सोच कर
सफ़र के सजदे में तुम
सिर झुकाना , माथा ठोक कर
रविवार, 26 सितंबर 2010
इतना चुप हो जाऊँ
कि बुत हो जाऊँ
तराशे गए हैं अक्स भी
मैं भी सो जाऊँ
सर्द आहों से पलट
जमाने की हवा हो जाऊँ
रूह को छू ले जो
रकीबों सी दुआ हो जाऊँ
कब बदलता है कोई
मैं ही काफिर हो जाऊँ
दर्द किसको नहीं होता
जुदा जिस्मो-जाँ हो जाऊँ
मंगलवार, 21 सितंबर 2010
क्या-क्या पास हमारे निकले
कोई शुबहा कहीं नहीं है
रात हुई और तारे निकले
अरमाँ की गलियों में यूँ ही
हम अपना दिल हारे निकले
कोई मंजिल कहीं नहीं है
टूट के बिखरे सितारे निकले
बाँध सके जो हमको देखो
झूठे सारे सहारे निकले
अपनी चादर में फूलों के
काँटों से ही धारे निकले
डूबें कैसे बीच भँवर में
दूर बहुत ही किनारे निकले
उँगली पकड़ेंगे वो अपनी
ऐतबार के मारे निकले
पराई धड़कन , पराई साँसें
क्या-क्या पास हमारे निकले
सोमवार, 13 सितंबर 2010
दम बड़ा लगता है
इसे जरा ' प्यार का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है ' की तर्ज पर गुनगुनाएँ ...
उधड़े रिश्ते सिलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है
उलझ गए हैं मन के धागे
सुलझाने में , रेशमी गाँठें फिर खुलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है
बिखर गए जो अरमाँ अपने
उजड़ी बस्ती , वीराने को फिर बसने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है
प्यार का पहला ख़त ये नहीं है
बिखरी उमंगें , फिर चुनने में दम बड़ा लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है
उधड़े रिश्ते सिलने में वक्त तो लगता है
बिखरे तिनके चुनने में वक्त तो लगता है
रविवार, 5 सितंबर 2010
छूटे न अपनी आस का झाला
कैसे मैं पी लूँ फिर हाला
यहाँ नहीं है कोई मीरा
और नहीं है कृष्ण रखवाला
दुख की रात बहुत लम्बी है
और पड़ा है जुबाँ पे ताला
किसने अपना धर्म है छोड़ा
सूरज ,चन्दा ,गगन मतवाला
हम भी आये हैं मन रँग कर
और ओढ़ कर एक दुशाला
जोग ,रोग ,सोग भोग कर
छूटे न अपनी आस का झाला
प्यास सभी को उसी घूँट की
जैसे जीवन हो मधुशाला

